Sunday 15 July 2007

माइक थेवर को जानना ज़रूरी है ।

माइक थेवर। हज़ार शोहरतमंद नामों में एक गुमनाम। मगर काम बेहद ज़रूरी। माइक थेवर वो काम कर रहे हैं जिसकी हिम्मत बड़े बड़े उद्योगतियों को नहीं हो सकी। माइक की एक कंपनी है। अमरीका के फिलाडेलफिया शहर में। १६० करोड़ टर्नओवर वाली कंपनी। माइक ने १५ साल की कड़ी मेहनत से तैयार की है। इसकी एक नीति है जो नई बहस और साहस के लिए प्रेरित करती है।माइक अपनी कंपनी के लिए सौ फीसदी अफरमेटिव एक्शन के तहत लोगों को नौकरी देते हैं। अफरमेटिव एक्शन यानी जब कंपनी सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े तबके को आगे लाने के लिए नौकरियां देती हैं। अमरीका में सारी बड़ी कंपनियां करती हैं। पत्रकारिता के बड़े अखबार वाशिंगटन पोस्ट में भी अफरमेटिव एक्शन लागू है। यानी तथाकथित मेरिट नहीं होने पर भी नौकरी।माइक अनुसूचित जाति जनजाति और ओबीसी के लड़कों को नौकरी देते हैं। हाल ही में उन्होंने २५ लड़कों का चयन किया है। इनमें से कोई भी नौकरी पाने की पात्रता नहीं रखता है। अमरीका न हिंदुस्तान में। लेकिन माइक इन्हें मुंबई में अमरीकन अंग्रेजी की ट्रेनिंग देंगे फिर ले जाएंगे। इससे पहले भी वो १५ लड़कों को नौकरी दे चुके हैं। ये लड़के मुंबई के धारावी के रहने वाले हैं। ज़्याजातर के मां बाप बड़ा पाव बेचने और आटो चलाने वाले हैं। वो अब अपने घर हर महीने पच्चीस हजार भेजते हैं। मां बाप की भी जिंदगी बदल रही है।
\u003cbr\>ये लड़के भी नौकरी पाने की पात्रता नहीं रखते थे। इनके चयन की एक ही पात्रता देखी गई...सामाजिक और आर्थिक रुप से सताए हुए तबके की पात्रता। माइक ने इन्हें व्हाईट कालर वाला बना दिया। जिसके लिए कई लोग लाखों खर्चते हैं। डिग्री लेते हैं। फिर कहते हैं हमारे पास मेरिट है। माइक सोचते हैं कि यह सब कुछ नहीं होता। काम का प्रशिक्षण देकर काम कराया जा सकता है। और वो शायद दुनिया की अकेली कंपनी के मालिक हैं जिनकी कंपनी में यह नीति सत्ताईस या बाइस प्रतिशत नहीं बल्कि सौ प्रतिशत लागू है। यानी सारी नौकरी अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़े तबके के कमजोर छात्रों को।\u003cbr\>\u003cbr\>\u003cbr\>अब माइक कौन हैं। वो केरल के गरीब ओबीसी परिवार के हैं। कई साल पहले इनका परिवार मुंबई के धारावी आ कर रहने लगा। स्लम में। माइक ने खुद बड़ा पाव बेचा है। मुंबई के निर्मला निकेतन से बैचलर इन सोशल साइंस की डिग्री ली। टाटा इंस्टि्यूट आफ सोशल साइंस से मास्टर डिग्री ली। एक दलित लड़की से शादी की। तमाम विरोध के बाद भी। और स्कालरशिप पर अमरीका चले गए। वहां उन्होंने स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाली एक कंपनी टेम्प्ट सल्यूशन कायम की। एक काययाब कंपनी। कामयाबी के बाद माइक को एक बड़ी ज़िम्मेदारी का अहसास हुआ। पिछड़े और सताए हुए तबके को लोगों को मौका देना का। जिस समाज से उन्हें मिला वो उसे वापस करना चाहते थे।\u003cbr\>\u003cbr\>फिर उनकी कंपनी की यह लाजवाब नीति सामने हैं। वहां किसी को मेरिट के आधार पर नौकरी नहीं मिलती है। माइक चुनते हैं। चुनते समय ध्यान रखते हैं कि जिसे मौका मिल रहा है उसमें भी सामाजिक प्रतिबद्धता है या नहीं। यानी वो आगे जाकर बाकी को आगे लाने में मदद करेगा या नहीं। माइक जल्दी ही अपनी कंपनी के लिए बिहार, उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों के ऐसे लड़कों को मौका देने की योजना लागू करने वाले हैं।\u003cbr\>\u003cbr\>यह कहानी इसलिए सुनाई कि एक दो रोज पहले भारत के बड़े उद्योगपति प्रधानमंत्री से मिलने गए। वो दो साल से अफरमेटिव एक्शन के नाम पर आना कानी कर रहे हैं। कहते हैं सरकार की बेकार आईटीआई संस्थानों को दीजिए और हम वहां ट्रेनिंग देकर देखेंगे कि ये काम करने लायक है या नहीं। क्यों भई अपने बाप की जमीन पर उद्दोग खड़े किए हैं क्या? तमाम रियायतें, आयात निर्यात नीति में बदलाव, फ्री की ज़मीन और आप दुनिया से कंपीट कर सके उसके लिए सरकार का समर्थन। कोई उद्योग कह दे कि उनकी कामयाबी में इन हिस्सों का योगदान नहीं है । मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं कि जिन गरीब बच्चों को माइक अमरीका ले जा रहे हैं अपनी कंपनी में नौकरी देने के लिए, वो गरीब बच्चे वहां के फुटपाथ या तीसरे दर्जे के होटल में नहीं ठहराये जाते हैं। वो सभी माइक के घर में रहते हैं। इसीलिए कहता हूं माइक थेवर को जानना ज़रूरी है ।",1]
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ये लड़के भी नौकरी पाने की पात्रता नहीं रखते थे। इनके चयन की एक ही पात्रता देखी गई...सामाजिक और आर्थिक रुप से सताए हुए तबके की पात्रता। माइक ने इन्हें व्हाईट कालर वाला बना दिया। जिसके लिए कई लोग लाखों खर्चते हैं। डिग्री लेते हैं। फिर कहते हैं हमारे पास मेरिट है। माइक सोचते हैं कि यह सब कुछ नहीं होता। काम का प्रशिक्षण देकर काम कराया जा सकता है। और वो शायद दुनिया की अकेली कंपनी के मालिक हैं जिनकी कंपनी में यह नीति सत्ताईस या बाइस प्रतिशत नहीं बल्कि सौ प्रतिशत लागू है। यानी सारी नौकरी अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़े तबके के कमजोर छात्रों को।अब माइक कौन हैं। वो केरल के गरीब ओबीसी परिवार के हैं। कई साल पहले इनका परिवार मुंबई के धारावी आ कर रहने लगा। स्लम में। माइक ने खुद बड़ा पाव बेचा है। मुंबई के निर्मला निकेतन से बैचलर इन सोशल साइंस की डिग्री ली। टाटा इंस्टि्यूट आफ सोशल साइंस से मास्टर डिग्री ली। एक दलित लड़की से शादी की। तमाम विरोध के बाद भी। और स्कालरशिप पर अमरीका चले गए। वहां उन्होंने स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाली एक कंपनी टेम्प्ट सल्यूशन कायम की। एक काययाब कंपनी। कामयाबी के बाद माइक को एक बड़ी ज़िम्मेदारी का अहसास हुआ। पिछड़े और सताए हुए तबके को लोगों को मौका देना का। जिस समाज से उन्हें मिला वो उसे वापस करना चाहते थे।फिर उनकी कंपनी की यह लाजवाब नीति सामने हैं। वहां किसी को मेरिट के आधार पर नौकरी नहीं मिलती है। माइक चुनते हैं। चुनते समय ध्यान रखते हैं कि जिसे मौका मिल रहा है उसमें भी सामाजिक प्रतिबद्धता है या नहीं। यानी वो आगे जाकर बाकी को आगे लाने में मदद करेगा या नहीं। माइक जल्दी ही अपनी कंपनी के लिए बिहार, उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों के ऐसे लड़कों को मौका देने की योजना लागू करने वाले हैं।यह कहानी इसलिए सुनाई कि एक दो रोज पहले भारत के बड़े उद्योगपति प्रधानमंत्री से मिलने गए। वो दो साल से अफरमेटिव एक्शन के नाम पर आना कानी कर रहे हैं। कहते हैं सरकार की बेकार आईटीआई संस्थानों को दीजिए और हम वहां ट्रेनिंग देकर देखेंगे कि ये काम करने लायक है या नहीं। क्यों भई अपने बाप की जमीन पर उद्दोग खड़े किए हैं क्या? तमाम रियायतें, आयात निर्यात नीति में बदलाव, फ्री की ज़मीन और आप दुनिया से कंपीट कर सके उसके लिए सरकार का समर्थन। कोई उद्योग कह दे कि उनकी कामयाबी में इन हिस्सों का योगदान नहीं है । मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं कि जिन गरीब बच्चों को माइक अमरीका ले जा रहे हैं अपनी कंपनी में नौकरी देने के लिए, वो गरीब बच्चे वहां के फुटपाथ या तीसरे दर्जे के होटल में नहीं ठहराये जाते हैं। वो सभी माइक के घर में रहते हैं। इसीलिए कहता हूं माइक थेवर को जानना ज़रूरी है ।

By Ravish Kumar...
(Ravish is one of the brilliant and social relevant tv journalist of India associated with NDTV. He can be contacted on RAVISH@ndtv.com. This story is also on his blog
http://naisadak.blogspot.com/)

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