Tuesday 29 May 2007

एक लेखक का काम क्‍या है

दिल्‍ली में हर रविवार को कुछ युवा लेखक एक पार्क में जुटते रहे हैं। पिछले दिनों राजधानी की सघन सृजनात्‍मक हलचलों में से आप इसे भी गिन सकते हैं। वे युवा जो रचनात्‍मक स्‍तर पर एक अच्‍छे समाज की कल्‍पना के साथ सक्रिय हों, उनका एक जगह लगातार जुटना एक ऐतिहासिक परिघटना की तरह ही है। ज़ाहिर है, जहां समूह होगा और लोकतंत्र उस समूह की बुनियादी शर्त होगी- मतभेद भी होंगे। ऐसे ही मतभेदों में से एक रहा- रचनात्‍मक सक्रियता की व्‍याख्‍याओं को लेकर। कुछ मानते रहे कि देश भर में होने वाले दमन और उसके खिलाफ खड़े जनांदोलनों के साथ प्रतीकात्‍मक सहमति के तौर पर एक लेखक को कलम के अलावा भी अपनी सक्रियता दिखानी होगी, तो कुछ को प्रदर्शन से जुड़ी हुई ऐसी सक्रियता गै़र रचनात्‍मक ज्‍यादा लगती रही। बात समूह टूटने तक पहुंच गयी है। लेकिन जो बहस है, वो सिर्फ इस समूह के लिए ज़रूरी नहीं है- रचनात्म‍कता की समझ को लेकर एक व्‍यापक संदर्भ में ज़रूरी बहस है। इसलिए हम दो नितांत व्‍यक्तिगत चिट्ठियों को मोहल्‍ले में बांच रहे हैं- ताकि विमर्श का ये संदर्भ ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों से जुड़े।
पहला पत्र, सहमतों के लिए एक खुला पत्र

साम्राज्‍यवाद विरोधी लेखक मंच एक नकारात्मक नाम है। संभवतः इसीलिए क्‍योंकि इसके तहत अब तक तमाम विरोधी तेवर ही प्रकट हुए हैं। वे रचना के नाम पर क्या कर रहे हैं, क्या कर सकते हैं, इसके लिए जगह बनती यहां नहीं दीखती है। लेखक के लिए मात्र रचना ही उसकी सक्रियता का प्रकाशित दस्तावेज होती है और उसकी सक्रियता की पड़ताल उसी आधार पर होती है। लेखक संघ में लेखक के लिए रचना का क्या मानी होता है यह जाहिर है। वह कहानी, कविता, आलेख, रिपोर्ताज आदि ही है, थोथी बकवास इसका विकल्प नहीं हो सकता। इस संघ में रचनात्मकता का यह हाल है कि हम केवल दूसरों की रचनाओं में मीन-मेख निकालते हैं। अपनी हालत यह है कि हम रद्दी रचनाएं छपवाकर उसके रद्दी होने की घोषणा भी अनंत हेकड़ी के साथ करते हैं। हमारी समझ से इससे ज्यादा गैर जिम्मेदाराना व्यवहार किसी लेखक संघ के लिए कुछ और हो ही नहीं सकता। जबकि वह लेखक ही भविष्य के इस संघ का घोषित प्रतिनिधि हो।

इन नकारात्मक संदर्भों में हम पहले तो लेखक संघ का नाम बदलकर वैज्ञानिक लोकतांत्रिक समाजवादी लेखक संघ रखना चाहेंगे। इसका काम संघ के युवा लेखकों की रचनात्मकता की पड़ताल व उसका विकास होगा। किसी लेखक की सक्रियता का अंतिम पैमाना उसका लेखन होगा, उसकी मौखिक दलीलें नहीं। हम अपने और बाहर के नवतुरिया लेखकों की रचनाओं को सामने लाएंगे और उनका सार्वजनिक पाठ कराएंगे। अपनी एक-एक पाई जोड़कर जुटायी गयी राशि को पिछले आयोजनों जैसे आयोजनों पर खर्च करने की हमारी कोई मंशा नहीं है। उस तरीके से सस्ता प्रचार पाना हमारा ध्येय नहीं है। किसी भी वैसे आयोजन को करने से पहले हम बुलेटिन, पुस्तिका, पत्रिका आदि निकालकर अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे। उसके बाद ही हम वैसा प्रदर्शनकामी, व्ययी आयोजन करेंगे, वह भी साल में एक या ज्यादा से ज्यादा दो होंगे।

इस लेखक संघ में शामिल लोगों के लिए हर सप्ताह बैठक में आना अनिवार्यता नहीं होगी। महीने में अगर कोई एक बार भी शामिल हो पाता है, तो उसकी वही अहमियत होगी जो हर सप्ताह नियमित आनेवालों की होगी। लेखकों का महत्व उनकी रचना के आधार पर होगा, उनकी उपस्थिति या जुमलेबाजी के आधार पर नहीं। अगर महीनों हमारी बैठकों में न भी कोई रचनाकार अगली बार किसी बेहतरीन रचना के साथ उपस्थित होगा तो उसकी सक्रियता को किसी से कम करके नहीं आंका जाएगा। सक्रियता पर सवाल पूछकर हम किसी लेखक को लज्जित नहीं करेंगे। क्योंकि सक्रियता ऐसी चीज नहीं है, जिसे ऊंची आवाज में बोलकर या सड़क पर खड़े होकर, चिल्ला कर दर्शायी जा सके। सक्रियता को संघ रचनात्मकता के आईने में देखेगा, इसके लिए कोई दूसरी कसौटी मान्य नहीं होगी। बाकी सक्रियता उसका निजी मुआमला होगा। उससे जुड़े सवाल यहां नहीं उठेंगे। सिगरेट फूंकना या डेढ़ इंच की पार्टियों की सर्वाधिक उल्लसित होकर चर्चा करने को हम सक्रियता के विरोध में अय्याशी या कुंठा से जोड़कर देखेंगे।

पत्रकारिता से जुड़े लेखक अगर अच्छी-बुरी घटनाओं की चर्चा करते हैं या रपट लिखते हैं या कहीं आते-जाते हैं, उसका मात्र सूचनात्मक महत्व ही होगा, लेखकीक सक्रियता से उसका कोई लेना-देना नहीं होगा। क्योंकि वह सक्रियता उनकी रोटी से जुड़ा एक पेशेवर कार्य भर माना जाएगा। स्वतंत्र पत्रकार इसके अपवाद होंगे।

पिछली बैठक में शब्द को पकड़ने पर आपत्ति की गयी थी। हमारा मानना है कि आम लोगों तक लेखक के रूप में हमारे शब्द ही पहुंचेंगे, हमारे चेहरे की छटा उसका विकल्प नहीं बनेगी।
कुमार मुकुल, स्वतंत्र मिश्र, पंकज चौधरी
अरविंद शेष, पंकज पराशर, अच्युतानंद मिश्र


प्रतिपत्र

पर्चा पढ़ा। पर शायद मैं इन दलीलों से सहमत न हो पाऊं। वैसे ये फर्स्‍ट हैंड रिएक्‍शन है और मुझे भी और सोचने की ज़रूरत है। पर मैं अपना नज़रिया इस पर्चे पर आपको लिख रहा हूं। सहमति-असहमति अपनी जगह है, पर कृपया इसे अन्‍यथा न लें। बहुत सालों पहले हमारे हिल्‍सा (बिहार) में, जहां से मैं हूं, एक संघ के आदमी से मेरी बात होती थी। बात नहीं बहस कहना ज्‍यादा उचित होगा। उनका कहना था कि आपलोग हर चीज़ का विरोध करते हैं और मुर्दाबाद करते हैं। आपके विज़न में और कुछ है ही नहीं। लालू और मुलायम जैसे समाजवादियों के सत्ता में आने और असफल हो जाने पर किसी ने कमेंट में कहा था कि चूंकि ये सिर्फ विरोध करना जानते थे, वही करके यहां तक पहुंचे थे, सो कोई अच्‍छा काम नहीं कर पाये। मुझे समझ में नहीं आता, लालू-मुलायम जैसे लोग सत्ता संतुलन तो सीख जाते हैं, पर अच्‍छा काम करना कैसे नहीं सीख पाते। मेरे ख़याल से ये उनकी ईमानदारी का प्रश्‍न ज्‍यादा है, योग्‍यता का उतना नहीं।

पर्चे में सबसे ऊपर जो बात है, वो मुझे कुछ कुछ वैसी ही लग रही है। चूंकि टाइटल में ही विरोध है, अत: यह एक नकारात्‍मक नाम है। मैं इससे सहमत नहीं हूं। मार्क्‍स का सारा लेखन कैपिटलिज्‍म और इसकी प्रवृत्तियों के खिलाफ है। इस मतलब यह नहीं कि उनके लेखन में कोई सकारात्‍मक पक्ष नहीं है। वैसे भी साम्राज्‍यवाद पूंजीवाद का वो स्‍वरूप है, जिसका विरोध ही हो सकता है। समर्थन तो कतई नहीं।

दूसरी बात ये कि चाहे गांधीवादी हों, समाजवादी हों, कम्‍युनिस्‍ट हों या नक्‍सल, सारे लोग एक राय से साम्राज्‍यवाद के खिलाफ हैं। और ये एक व्‍यापक सहमति का आलेख हो सकता है, जो हमारे मंच में है। कम से कम मैं तो यही समझ कर इसमें अपने को शामिल मानता हूं। एक और बात पर्चे में लिखी है कि लेखक की पहचान उसके लेखन से होना चाहिए, राजनीतिक सक्रियता से नहीं। मैं ये ज़रूर मानता हूं कि लेखक की पहचान उसकी रचना से होती है, पर लेखक सिर्फ लेखक ही है, ऐसी बात मुझे नहीं लगती। एक तो ये कि वो किसी समाज, राष्‍ट्र का अंग होता है। पहले वो एक नागरिक होता है, बाद में लेखक या कुछ और। अगर कोई ये कहे कि मज़दूरों को सिर्फ मज़दूरी से मतलब रखना चाहिए, और किसी चीज़ से नहीं, क्‍योंकि उसका काम मज़दूरी करना है और उसकी पहचान उसके अच्‍छे काम से ही है, जैसा कि आप कह रहे हैं कि लेखक का उसकी रचना से- तो ये ठीक नहीं है। हां, अगर कोई मीन-मेख निकालता है तो ग़लत है, चाहे जो भी हो। किसी भी रचना का क्रिएटिव क्रिटिक होना चाहिए न कि उसका मज़ाक उड़ाना। चाहे कोई अपनी रचना का करे या किसी और की- मेरी नज़र में ये ग़लत है।

आप लिख रहे हैं कि पत्रकारीय चीज़ों का महत्‍व नहीं होगा। फिर तो मैं वैसे ही बाहर हो जाऊंगा। क्‍योंकि मैं कविता-कहानी वगैरह नहीं लिखता। दरअसल लिखना ही नहीं आता। आप भी वही ग़लती दोहरा रहे हैं, जिसकी अपेक्षा आप दूसरों से नहीं करते। आप नहीं चाहते किसी व्‍यक्ति या रचना का मज़ाक उड़ाया जाए और खुद व्‍यक्ति का मज़ाक उड़ा रहे हैं। जिस छोटी बात पर वहां बहस शुरू हुई थी, वो इतनी बड़ी नहीं कि उसे इतना तूल दिया जाए क्‍योंकि मैं वहां खुद था।

उम्‍मीद करता हूं, सब मिल कर कुछ अच्‍छा करने की कोशिश करेंगे क्‍योंकि वक्‍त की यही मांग है। अगर कोई ग्रुप असफल होता है, या जनता के हित में चल रहे किसी आंदोलन या काम में रुकावट आती है, असफलता मिलती है, तो ये हम सबकी विफलता मानी जाएगी। कल कोई ये नहीं पूछेगा कि वजह क्‍या थी। लोग बस इतना ही पूछेंगे कि आप चुप क्‍यों थे। आपको ब्रेख्‍त की कविता याद होगी। जहां तक लेखकों की साहित्‍य से इतर सक्रियता का सवाल है- हमारे सामने वाल्‍टर बेंजामिन, क्रिस्‍टोफर कॉडवेल, लोर्का, नेरुदा से लेकर तमाम तरह के उदाहरण हैं। मैं खुद को इसी परंपरा में रखना चाहूंगा।

उम्‍मीद करते हैं आप मेरे तर्कों को तरजीह देंगे। इसे किसी चश्‍मे से नहीं देखेंगे।

आपका,
मृत्‍युंजय

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